सांझी तपन
कहीं किसी रोज़ यूहीं ,
चलते चलें जाएँ।
जो राह में कांटे हैं तेरी ,
चुनते चले जाएँ।
बुनते चादरों के ताने - बाने में ,
रिश्तों की डोर बाँधी है,
सुलगते उपलों की सौंधी तपन में,
एक रात सांझी है।
न कागज़ न स्याही हो ,
लिखते चलें जाएँ।
कहीं किसी रोज़ यूहीं ,
चलते चलें जाएँ।
जो राह में कांटे हैं तेरी ,
चुनते चले जाएँ।
संजय जैन 'संकु '
बहुत ही अच्छी कविता है
ReplyDeleteKeep it up
Dhanywad Anushaji
Deleteमस्त यु ही लिखतें चले जाएँ..
ReplyDeleteThanks beta
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