तुम
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तुम शांत दीपशिखा हो,
मैं बेलगाम सा अंधड़.
तुम महकी सी पुरवा हो,
मैं प्यासा-प्यासा सावन.
जीवन के ऋतु -उपवन में
तुम हर मौसम हो जाती हो,
मैं पतझर का पत्ता हूँ
तुम वसुंधरा सी पावन.
तेरे यौवन का जादू
हर ओर हुआ दिखता है,
तुम शीत की मखमल धूप हो
मैं बिखरा- पसरा आँगन.
जब अर्थ नहीं होता है
इस एकाकी जीने में ,
मैं प्रश्न-चिन्ह लगता हूँ
तुम बन जाती हो कारण .
संजय जैन 'संकु'
२४ फरवरी १९९० में रचित, जब मेरी सगाई अनु से हुई थी.
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