Friday, 2 March 2018

PHAGUN




ऐसे में फागुन मत आना 



भीनी-भीनी मधु- गंध हवा,
सुरभित मौसम का इतराना. 
जब पिया भये हों परदेसी ,
ऐसे में फागुन  मत आना. 


अबीर- गुलाल किल्लोल कर रहे,
ऋतूराज बसंत का तरसना।
जब नेह-पवन बौराई हो 
तब प्रेम संदेशा मत लाना. 


फगुआ गीतों की तान तनी 
मृदंग बहक तुम मत जाना. 
जब रूप खिला  हो आँगन में 
अल्हड़ प्रेमी तुम मत गाना।


रस बरसा ही नहीं प्रेम का 
हाथों का रंग न रंग जाना. 
पिया प्रेम रंग की बावरी मैं 
बिन रस बरसाए मत जाना. 


अमुआ में बौराई कोयलिया की 
कुहुक पिया तुम सुन जाना. 
जब टेसू-दल बिखरें भू पर 
रति-सेज पिया तुम कर जाना. 


इक दिन बीता -
                     इक युग बीता ,
बिन तेरे रूप का ढल जाना. 
जब तक न आये परदेसी पिया 
फागुन तब तक ही ठहर जाना. 
जब पिया भये हों परदेसी 
ऐसे में फागुन मत आना. 


                     संजय जैन 'संकु'


26 जनवरी 1986 . 

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