Sunday, 4 February 2018

Saanjhi tapan

सांझी  तपन 


 कहीं  किसी  रोज़  यूहीं ,
        चलते  चलें  जाएँ।
जो  राह  में  कांटे  हैं तेरी ,
         चुनते  चले  जाएँ। 

बुनते  चादरों  के  ताने - बाने  में ,
        रिश्तों की डोर बाँधी है,
सुलगते  उपलों  की  सौंधी  तपन में,
         एक  रात  सांझी  है। 
न कागज़  न  स्याही  हो ,
         लिखते चलें जाएँ। 

  कहीं  किसी  रोज़  यूहीं ,
        चलते  चलें  जाएँ।
जो  राह  में  कांटे  हैं तेरी ,
         चुनते  चले  जाएँ।      


             संजय जैन 'संकु '

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