कोयला
मेरी खदान का बहुत
गरम है कोयला,
हम धूल खाते
और धुआं पीते हैं.
फिर भी हंसी ख़ुशी से जीते हैं.
यह कोयला -
जो देश की धरोहर है.
इसकी ऊष्मा से
देश की चिमनियां ज़िंदा हैं.
इसकी ऊर्जा से
देश वासियों की धमनियां ज़िंदा है.
यह कोयला -
जो भूखे की रोटी और प्यासे का पानी है.
यह कोयला -
जो हर बच्चे का बचपन
और मर्द की जवानी है.
कौन कहता है यारों
कि कोयले का रंग काला होता है,
अरे ये कोयला तो
सुर्ख़ लाल होता है.
जो जीवन देना भी जानता है
और जीवन लेना भी.
क्योंकि -
बहुत गरम है
मेरी खदान का कोयला.
संजय जैन 'संकु'
२२ नवम्बर १९९६.