दोस्त
एक नहीं अनेक थे ,
पर उनमे से कुछ नेक थे,
बचपन के संगी साथी ,
उनमे थे कुछ उत्पाती,
कुछ थे बहुत लड़ाकू,
कुछ थे बहुत पढ़ाकू,
कुछ मस्तीखोर , कुछ दांवजोर,
थी शैतानी कुछ के पोर पोर,
हम - साथ ज़ोर, कुछ दगाबाज़
थे सब के दिल के खुले राज़,
कभी गांव गांव , कभी सड़क सड़क,
कभी छाँव -धूप में धूम धड़क
कभी पाठ पढ़ें या इतरायें ,
कभी डाल डाल पे छितरायें,
नदिया,जंगल,झरने,पहाड़ ,
बौने लगते हम सबकी धाड़,
कभी मुड़े नहीं, कभी रुके नहीं,
बच्चे थे फिर भी झुके नहीं,
कितने प्यारे थे दोस्त मेरे,
कितना प्यारा वो बचपन था,
दुनियावी सपनों से दूर ,
कितना प्यारा वो खुश मन था,
न दोस्त पुराने हैं अपने,
न ही प्यारा सा वो बचपन है,
बाल कपासी हो चले अब,
यारा ये उमर तो पचपन है,
संजय जैन 'संकु'
बहुत खूब...बचपन की याद ताजा हो गई
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