प्रजातंत्र का फ्रीज़र
कैसे लिखूं कविता ,
कैसे खुद को समझाऊं
अपनी उलझन में
क्यूँ सबको उलझाऊँ
राह काँटों से भरी है
पार मेरी मंज़िल खड़ी हैं ,
दिल में लगे हैं कीले
पैरों में बेड़ी पड़ी है.
हर एक ज़िंदा इंसान में
अरमा की लाश गड़ी है.
नहीं देती बदबू क्यूकि ,
प्रजातंत्र के फ्रीज़र में सड़ी है.
लाश की तस्वीर सुन्दर
फ्रेमों में मढ़ी है.
हर एक सांस अपनी
किस्मत से लड़ी है,
क्युकि इंसानियत की
रोटी बहुत कड़ी है.
देश के हर नागरिकों की किस्मत
दिल्ली के सर्राफों ने जड़ी है.
कितने सुन्दर नीलम - पन्ने
चिथड़ों पे लगे हैं,
नारों की विशाल दीवार खड़ी है.
आयोजनों - प्रयोजनों की
सावन सी झड़ी है.
कुछ तो समझ ए दिल
कैसे तुझे समझाऊं ,
अपनी उलझन में
क्यूँ सबको उलझाऊँ
--- संजय जैन 'संकु'
15th August 1983 .
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