सावन की पहली फुहार
भीगी-भीगी सुरगंध सजी
प्रियवर की कोकिल पुकार ,
नहीं भूलती, उम्र बीती
वह सावन की पहली फुहार.
पानी की बुँदे यों छनकती
महुआ तन से निथर रहा,
तन तो क्या अंतर्मन महका
दैव - गंध ज्यों बिखर रहा.
हरित धरा के कोने से
वन-देवी कर रही गुहार,
नहीं भूलती उम्र बीती
वह सावन की पहली फुहार.
थिरक-थिरक जैसे मोर नाचते
तरुणी की तरुणाई थिरकी ,
पग पायलिया गूंज उठी तब
झूमी जब यौवन की फिरकी,
श्याम-सलोना रूप सज रहा
क्यों न हो सब कुछ निसार,
नहीं भूलती उम्र बीती
वह सावन की पहली फुहार.
अंग - अंग रस - रूप छलकता
है आस लगी मनभावन की,
' ओ ' सावन उनसे कहना
तुम बिन राख हुई ऋतू सावन की ,
बिन साजन के प्राण लेंगी ये
सावन की मदभरी फुहार,
नहीं भूलती उम्र बीती
वह सावन की पहली फुहार.
संजय जैन "संकु "
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