Saturday, 9 June 2018

Sidoori sham

                           सिन्दूरी शाम                              



शाम रात के गले मिल रही है 
शहर में सुरमई झुरमुटा  ठहरने लगा है ,
दरख्तों की शाखों / नदियों के सीने से
वह लिपटने लगा है,
क्षितिज / ब्याहता सा घूंघट उतरने लगा है। 

शहर की मेहनतकश भीड़ दम तोड़ कर 
हिल रही है,
गलियां / सड़कें वीरानियों से स्तंभित 
हो रही हैं। 
लटक गयी हैं, रौशनी की कंदीले 
उदास सड़कों पर,
बहती सरिता की वेगमयी धारा का स्वर 
अधिक स्पष्ट और शांत है। 

देखो चाँद / हाँ चाहत का चाँद 
सूखे दरख़्त के पीछे कैसा दमक रहा है,
और सरिता के निर्मल प्रवाह में धुलती चांदनी। 
अहा ! प्रिय सब कुछ कितना अलौकिक है। 

दो सपनीली आँखें मुंतजिर हैं,
तुम्हारे आहट की / तुम्हारे आने की ,
आ ही जाओ प्रिय 
                          इस संध्या को सिन्दूरी करने। 


                                                             संजय जैन "सँकु "



४ अक्टूबर १९८५, रायपुर


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