सिन्दूरी शाम
शाम रात के गले मिल रही है
शहर में सुरमई झुरमुटा ठहरने लगा है ,
दरख्तों की शाखों / नदियों के सीने से
वह लिपटने लगा है,
क्षितिज / ब्याहता सा घूंघट उतरने लगा है।
शहर की मेहनतकश भीड़ दम तोड़ कर
हिल रही है,
गलियां / सड़कें वीरानियों से स्तंभित
हो रही हैं।
लटक गयी हैं, रौशनी की कंदीले
उदास सड़कों पर,
बहती सरिता की वेगमयी धारा का स्वर
अधिक स्पष्ट और शांत है।
देखो चाँद / हाँ चाहत का चाँद
सूखे दरख़्त के पीछे कैसा दमक रहा है,
और सरिता के निर्मल प्रवाह में धुलती चांदनी।
अहा ! प्रिय सब कुछ कितना अलौकिक है।
दो सपनीली आँखें मुंतजिर हैं,
तुम्हारे आहट की / तुम्हारे आने की ,
आ ही जाओ प्रिय
इस संध्या को सिन्दूरी करने।
संजय जैन "सँकु "
४ अक्टूबर १९८५, रायपुर
शाम रात के गले मिल रही है
शहर में सुरमई झुरमुटा ठहरने लगा है ,
दरख्तों की शाखों / नदियों के सीने से
वह लिपटने लगा है,
क्षितिज / ब्याहता सा घूंघट उतरने लगा है।
शहर की मेहनतकश भीड़ दम तोड़ कर
हिल रही है,
गलियां / सड़कें वीरानियों से स्तंभित
हो रही हैं।
लटक गयी हैं, रौशनी की कंदीले
उदास सड़कों पर,
बहती सरिता की वेगमयी धारा का स्वर
अधिक स्पष्ट और शांत है।
देखो चाँद / हाँ चाहत का चाँद
सूखे दरख़्त के पीछे कैसा दमक रहा है,
और सरिता के निर्मल प्रवाह में धुलती चांदनी।
अहा ! प्रिय सब कुछ कितना अलौकिक है।
दो सपनीली आँखें मुंतजिर हैं,
तुम्हारे आहट की / तुम्हारे आने की ,
आ ही जाओ प्रिय
इस संध्या को सिन्दूरी करने।
संजय जैन "सँकु "
४ अक्टूबर १९८५, रायपुर
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